‘’पुलिस ने बेवजह हमे मारकर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है’’

     मेरा नाम आशा देवी मेरी उम्र 48 वर्ष है| मेरे पति सुरेन्द्र है। मेरे पास  चार बच्चे है एक लड़का व तीन लडकिया है जिसमे से एक बेटी की शादी हो गयी है| मै बनी मजदूरी करती हूँ| मै ग्राम-बैरवन,थाना-रोहनिया जिला-वाराणसी की मूल निवासिनी हूँ 

16 मई, 2024 को जो कूछ हुआ वह बहुत ही दुखदायी था|जिसे मै आज तक नही भूल पायी हूँमेरे जमीन पर सुबह लगभग 7 बजे बारह थाना की पुलिस 7 जेसीवी लेकर आयी| और हमारे खेत से मिट्टी निकालने लगी। जब यह खबर मुझे हुई तो मै और मेरे पति दोनो अपने खेत पर गये| वहा का मंजर देखकर हम घबरा गयेकुछ दूर पहले से ही पुलिस वाले सभी लोगो को दौड़ा-दौड़ाकर मार रहे थे| यह देखते ही मै डर से बगल के सुखई देवी के घर में घुस गयी की पुलिस की नजर हम पर न पड़े|पति भी छिपने के लिए जगह ढूढने लगे| अभी वह छुपना चाह रहे थे| तभी लगभग 15-20 पुलिस आकर मेरे पति को लाठी- डंडे से से बुरी तरह मारने लगी| पति जोर-जोर से चिल्ला रहे थे लेकिन पुलिस वालो ने उन्हें नही छोड़ा| पुलिस ने मारकर उनका हाथ तोड़ दिया 

पैर व कमर पर भी लाठिया बरसायी| काफी चोट पहुँचाया|मेरे पति जब गिर कर वेहोश हो गये | तो पुलिस दूसरे लोगो को मारना शुरू कर दिया|मै उस समय घर के अन्दर मै रो बिलख रही थी| पति की मदद कैसे  करू| सोच रही थी कि अगर मेरी आवाज बाहर निकलेगी तो पुलिस मुंझे मारकर जान ले लेंगी| मै उस वक्त बेबस थी| पुलिस वाले उग्र थे| वह जानवरों की तरह लोगो को मारपीट रहे थे| मुझे भी कुछ हो जाता तो पति को कौन देखता|आज भी उस दिन को याद करती हूँ तो रोया खड़ा हो जाता है| ऐसी घटना मेरे जीवन में कभी नहीं हुई| हम बार-बार यही सोचते कि पुलिस वाले इस तरह का वर्ताव हमारे साथ क्यों कर रहे है। एक तो हमारे जमीन में जेसीबी भी चलवा रहे है और हमलोग को मार भी रहे है। शाम लगभग 5 बजे तक यह सब चलता रहा जब चारो तरफ सन्नाटा सा छाया| मै  और सुखदेई देवी दोनो ने दरवाजा खोला तो उस समय पुसिल नहीं दिख रही थी । हम अपने पति को ढूढने लगे तभी मेरी नजर बगीचे में गयी|पति वेहोश होकर गिरे थे। इतना देखते ही हम जोर-जोर से रोने लगे। मेरे रोने की आवाज सुनकर बगल के लोग मेरे लड़के को बताये।यह सुनकर बेटा मेरे पास आया|दोनों माँ बेटे पति को लेकर आटो से बनारस के हड्डी के डाक्टर रामविलास के यहाँ पहुँचे। डाक्टर ने पति का एक्स-रे किया| बोला दो जगह हाथ की हड्डी टुटी है|इनके हाथ में राड पडे़गा। यह सुनते ही हम घबरा गये|दिमाग में बस यही आ रहा था की इनका ईलाज के लिए पैसा का इन्तेजाम कहा से करे| बस्ती में उस वक्त हर लोगो के घरो में परेशानी थी| उस समय हम अपने कान में सोने की झाला पहने  थे। 

    उसे निकालकर बेटे से कहे कि जाओ किसी सुनार के यहा बेचकर कुछ पैसे का इन्तजाम करके आओ। पति को हास्पिटल में भर्ती कराकर बेटा झाला बेचने चला गया। उसे बेचकर पचीस हजार रूपये मिला जिसको डाक्टर को देकर पति का इलाज शुरू हुआ। हम बार-बार यही भगवान से यही दुआ करते  हे ईश्वर मेरे पति को बचा लिजिए अस्पताल में हम अपने पति को चार दिन तक लेकर भर्ती थे। पति के हाथ में दो जगह राड पड़ा हुआ है। दिनांक 20 मई 2023 को लगभग साढ़े पांच बजे  हास्पिटल से अपने पति को घर लेकर आये। हास्पिटल में डेढ़ लाख रू0 खर्च हुआ। हम काफी कर्ज में डूबे गये है।समझ में नही आ रहा है की यह कर्ज कैसे चुकाये| राड की वजह से पति काम पर नही जाते| हर समय शरीर व हाथ में दर्द होता रहता है।पहले जैसा कुछ भी नही रहा| इस पूरी घटना ने हम लोगो को पूरी तरह से तोड़ दिया ही| आज भी जब इसके बारे में सोचते है तो हाथ पैर कापने लगता है| वह मंजर आज भी मेरे आँखों के सामने नजर आता है| हर समय डर बना है कि कही आने जाने का मन नही करता| 

    पुलिस ने  बेवजह हमे मारकर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है|मै चाहती हूँ कि पुलिस वालो के इस बर्ताव के खिलाफ कार्यवाही हो जिससे मुझे न्याय और सुरक्षा मिल सके|

                                                                                             संघर्षरत पीड़िता

                                                                                                                आशा देवी

          

      ‘साहब हमारी गलती क्या है,लेकिन पुलिस ने मेरी एक न सुनी वर्वरता से मुझे पीट रहीं थी’’

    मेरा नाम बबलू है| मेरी उम्र 38 वर्ष है|मेरे पिता का नाम छन्नू लाल है| मै ग्राम-बैरवन, पोस्ट-गंगापुर, थाना-रोहनिया, जिला-वाराणसी का मूल निवासी है। मै बनी मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करता हूँ।

        घटना 16 मई, 2023 की है| हमारी जमीन पर पुलिस व प्रशासन के लोग जबरजस्ती अधिग्राहण कर रहे थे। मै अपनी बाग की जमीन पर खड़ा होकर इसका विरोध कर रहा था| तो पुलिस शासन और प्रशासन के सह पर हम लागो के उपर लाठी चार्ज करने लगे| मै वहा से भाग पाता तभी पुलिस ने दौड़ाकर मुझे पकड लिया और लाठी डन्डो से मुझे बड़ी वेरहमी से मारने लगे। मै चिल्ला रहा था साहब हमारी गलती क्या है|लेकिन पुलिस ने मेरी एक न सुनी वर्वरता से मुझे पीट रहीं थी। मेरे शरीर के सभी जोड़-जोड़ पर मार रही थी| मारने के बाद पुलिस मुझे रोहनिया थाने ले गये| उसके बाद शाम 6 बजे के लगभग मिसिरपुर सरकारी हास्पिटल में मेडिकल करवाया। मेडिकल कराने के बाद वापस रोहनिया थाने लाये| रात में ही मुझे 11 बजे कैण्ट थाने लेकर गये| हवालात में बंद कर दिया|उस वक्त बस यही लग रहा था| पुलिस मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही है|

    रात भर हवालात में मै यही सोचता रहा| मैंने कौन सा गुनाह किया है जिसकी सजा मुझे मिल रही है| मेरो जमीन है आज बरसों से हम लोग उसी से अपना खर्च चला रहे है| आज प्रशासन उसे हथियाने के लिए मेरे साथ अपराधियों की तरह व्यवहार कर रही है|यही सब सोचते-सोचते रात बीत गयी| सुबह लगभग 11 बजे  पुलिस हमे कचहरी ले जाकर न्यायालय में पेश किया | उसके बाद मुझे चौकाघाट जेल ले जाकर कारागार में बन्द कर दिया गया।मेरे जाने के बाद परिवार के लोग मेरी जमानत के लिए कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाते रहे। 18 दिन बाद मेरी जमानत मंजूर हुई|मै  जमानत से पर रिहा हुआ| मै घर आया| यह सब हमारे लिए बहुत ही तकलीफ देय था| पुलिस ने बेवजह मै गिरफ्तार हुआ| मुझसे  अमानवीय व्यवहार किये गये|

    जिसे मै जीते जी नही भूल सकता| सब कुछ मेरा है| लेकिन प्रशासन उस पर अपनी मर्जी चला रही है|  अभी भी इसी बात की चिंता है। शासन प्रशासन के लोग दुबारा जमीन अधिग्रहण करेगे तो क्या  होगा| इसका डर हमेशा बना रहता  है। इस घटना के बाद से घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गयी कि समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करू।

    काम करने का मन नहीं करता है। मन बहुत दुखी रहता  है। जब उस दिन को याद करते है तो बहुत तकलीफ होती है| हमारा बहुत कुछ  बिखर गया। जेल से आने के बाद बहुत बुरा लगता है| कही आने जाने में भी हिचकिचाता हूँ| रात को नीद नही आती है|किसी से  बात करने का मन नहीं करता है।

    मै बस यही चाहता हूँ कि पुलिस ने हमारे साथ जो गलत किया है उसकी सजा उन्हें मिले|जिससे भविष्य में दुबारा हमारे साथ कुछ गलत न हो|

                                                                                                     संघर्षरत पीड़ित

                                                                                                                   बबलू

 

मेरा बेटा दौड़ते हुए आया और घबराई हुई आवाज़ में बोला, "आप लोग घर छोड़ कर भाग जाएँ, पुलिस सभी को दौड़ा-दौड़ा कर मार रही है

    मेरा नाम हरिशंकर है|  मेरी उम्र 60 वर्ष है। मेरे परिवार में कुल 13 लोग हैं, जिनमें 5 बच्चे और बड़े| मेरी पत्नी सावित्री घर गृहस्थ महिला है| वह घर के साथ-साथ फूलों की खेती में भी मेरी मदद करती थी जिससे मेरे परिवार का खर्चा चलता है| मैं ग्राम बैरवन मोहन सराय, पोस्ट गंगापुर, ब्लाक व तहसील राजातालाब, थाना रोहनिया, जिला वाराणसी का रहने वाला हूँ।

    16 मई 2023 को मै जीते जी नही भूल सकती|इस घटना ने हमारी जिंदगी को हिला कर रख दिया।उस दिन हम लोग घर पर फूलों की गुथाई का काम कर रहे थे। अचानक मेरा बेटा सदानंद दौड़ते हुए आया और घबराई हुई आवाज़ में बोला, "आप लोग घर छोड़ कर भाग जाएँ, पुलिस सभी को दौड़ा-दौड़ा कर मार रही है। मुझे भी पुलिस ने डंडे से मारा हैं मेरा हाथ बहुत दर्द कर रहा हैं और मेंरे पीठ पर दाहिने तरफ ज्यादा चोट लगी है।" इतना कहते ही वह घर से बाइक की चाभी लेकर मोटर बाइक पर सवार हो गया और पुल की तरफ भाग गया।

    यह सुनकर मैं भी डर से तुरंत घर से निकल कर सिवान की ओर भागा। मेरी पत्नी, मेरी बेटियाँ और बहुएँ घर के अंदर दरवाजा बंद कर लिए। कुछ ही देर में पुलिस हमारे घर आयी| दरवाजा तोड़ कर घर के अंदर घुसी। जब उन्हें कोई आदमी नहीं दिखा, तो वे वापस चले गए।पुलिस को देखकर औरते बुरी तरह डर थीं| मैं भी सिवान में छिपा था लेकिन घर की फ़िक्र लगी थी|पता नही वह लोग किस हाल में होंगे|

    काफी देर बाद जब सन्नाटा हुआ तो मैं घर लौटा, तो पता चला कि पुलिस ने गांव में हल्ला मचा दिया है कि  200 अज्ञात लोगो को  दर्ज किया है।जिसमे 11 लोगो को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है| यह सुनकर सभी लोग डरे सहमे हुए थे, न जाने किसको कब उठा ले जाएं।इसी वजह से अपनी तीनों बहुओं को उनके मायके पहुंचा दिया।वहा वह सुरक्षित रहेगी| उस वक्त घर पर रहना, खाना, सोना सब दूभर हो गया था| अपने ही घर में हम भयभीत हो रहे थे। हर समय डर बना रहता था कि कब पुलिस आकर हमें भी पकड़ ले जाएगी।कई दिनों तक हम दहशत में जीवन गुजर रहे थे| काम धाम सब छुट गया था| लोग डर से काम पर नही जा रहे थे| आज भी उस दिन को याद करता हूँ तो बहुत तकलीफ होती है| भगवान यह दिन किसी को न दिखाए|

    फूलों की खेती जो हमारे जीने का सहारा है| हमे डर है की कही वह हमसे छीन न जाये| मैं और मेरी पत्नी ने कड़ी मेहनत से अपनी जमीन को उपजाऊ बनाया है। उसकी आमदनी से हमारे परिवार का खर्च चलता है।पहले हम अपनी मेहनत की कमाई से खुश रहते थे, लेकिन अब हर दिन चिंता में बीत रहा है। हमारे गांव में पुलिस की इस कार्रवाई से सभी लोग डरे हुए हैं। किसी को नहीं पता कि अगला नंबर किसका होगा।

        मैं चाहता हूँ कि पुलिस ने जो हमारे साथ किया है उनके खिलाफ कार्यवाही हो जिससे हमे न्याय और सुरक्षा मिल सके|

                                                                                                    संघर्षरत पीड़ित

                                                                                                        हरिशंकर


‘’अभी भी डर है कि प्रशासन हमारी जमीन, और घर सब कुछ ले लेंगा ‘’

मेरा नाम जयनारायण उपाध्याय है। मेरी उम्र लगभग 79 वर्ष है| मेरे पिता है| मैं इस गाँव का पुरोहित हूँ| गाँव में लोगों के घर  पूजा-पाठ करता हूँ। मेरे परिवार में कुल 9 लोग हैं, जिनमें 2 बच्चे  और बड़े हैं। मेरे बेटे की किराने की दुकान है और 4 कमरे किराये पर दिए हैं, जिससे हमारे परिवार का खर्च चलता है। है।मै ग्राम बैरवन मोहन सराय, पोस्ट गंगापुर, ब्लाक व तहसील राजातालाब, थाना रोहनिया, जिला वाराणसी  का मूल निवासी हूँ|

16 मई 2023 की तारीख थी|यह घटना विकास प्राधिकरण उत्तर प्रदेश की मंशा से घटी| जबकि पहले से ही इन जमीनों पर याचिका कोर्ट में विचाराधीन है। बात यह है की विकास प्राधिकरण उत्तर प्रदेश द्वारा वर्ष 1998 में ट्रांसपोर्ट नगर बनाने की योजना लायी गई। वर्ष 2002 में मौजा बैरवन, मोहन सराय, कन्नागढ़ी और मिल्किचक के लगभग 11,000 कास्तकारों का नाम खतौनी से काट दिये गये| उनकी जमीन काबिज कर उन्हें  कोई  मुआवजा  नही दिया गया| मौजों के बैनामा पर भी रोक लगा दी गई।

वर्ष 2003 में प्रति विस्वा पाच हजार और दस हजार के हिसाब से  मुआवजा लगाया गया| जिसमें 30,32 लोगों ने मुआवजा मिला। इसके बाद सब कुछ शांत हो चुका था। वर्ष 2011 में मुआवजा न लेने वालों ने मिलकर पुलिस चौकी के बगल में धरना दिया। इस धरने में डीएम महोदय आए और उन्होंने किसानों से कहा कि आपके हक में फैसला होगा और आप सभी धरना बंद कर दीजिए।

वर्ष 2011 में 40-45 लोगों को मुआवजा मिला । हम लोगो ने मिलकर माननीय कोर्ट में अपने मांगों के साथ विकास प्राधिकरण के विरुद्ध याचिका दायर की, जो कोर्ट नं. 42 में चली। कोर्ट नं. 42 में विकास प्राधिकरण अधिकारी के चाचा जज थे|फैसला विकास प्राधिकरण के हक में होने का अंदेशा था| प्रयास करके इसे कोर्ट नं. 39 में रेफर करा लिया गया| कोर्ट नं. 39 में फैसला आया कि जिन्होंने मुआवजा नहीं लिया है, उनका मालिकाना हक बना रहेगा।

इसके बाद 12 मई 2023 को विकास प्राधिकरण के अधिकारी आए और पैमाईश करने लगे। ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और वे वहा से चले गए। 13 और 14 मई 2023 को भी अधिकारी आए और ग्रामीणों ने फिर से विरोध किया। 14 तारीख को अधिकारियों ने कहा कि वे अगले दिन फिर आएंगे और कोई बात नहीं होगी, जिसको चाहें बुला लेना।

16 मई 2023 को 36 वाहिनी मयफोर्स पुलिस बल के साथ कब्जे के उद्देश्य से अधिकारी आए। कृष्णा पटेल, जिसने मुआवजा नहीं लिया था, उसने विरोध किया।जिस पर पुलिस ने उसे बुरी तरह मारा और वह वहीं गिर गया। उस वक्त जगह-जगह चारों ओर जेसीबी चल रही थी और गाँव के लोग विरोध कर रहे थे।पुलिस ने   लाठी चार्ज किया चारो ओर अफरा-तफरी मच गई। पुलिस जिसे पाती उसे मारती| चाहे वह औरत हो या आदमी मुझे भी दो लाठियाँ लगीं गाँव वालों ने मुझे सहारा देकर बाहर निकाला और मेरा ईलाज  प्राइवेट अस्पताल में हुआ। सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में ईलाज नही मिला|सारे सरकारी संस्थान उस वक्त एक हो गये थे| यह सब देखकर बहुत अफ़सोस हो रहा था|

वकीलों के सहयोग से हमें माननीय हाई कोर्ट से स्टे ऑर्डर मिला। लेकिन अभी भी डर है कि प्रशासन हमारी जमीन और घर सब कुछ ले लेंगा|वह भी मामूली दाम पर,इतनी महंगाई में हम कम पैसो में  जाकर कही बस नहीं सकते।दिन रात इसी फ़िक्र में नीद नही आती| सोचता हूँ तो मन घबराता है|अजीब सी उलझन बनी रहती है|कही आने जाने का मन नही करता पहले जैसा कुछ भी नही रहा| इस घटना ने हमारे जीवन को हिला कर रख दिया है।

मैं चाहता हूँ कि हमारी जमीन न ली जाए और सभी मुआवजा न लेने वाले कास्तकारों का नाम खतौनी पर चढ़ाया जाए। यह हमारी जीवन भर की मेहनत और हमारी पहचान है। अगर हमें हमारी जमीन से बेदखल कर दिया गया, तो हम कहीं भी नहीं जा पाएंगे और हमारा जीवन बर्बाद हो जाएगा।

                                                                                               संघर्षरत पीड़ित

                                                                                                      जयनारायण उपाध्याय


‘’पुलिस गाँव के 11 लोगों को पकड़ कर ले गई थी, हमें डर था कि कहीं वे हमें भी न पकड़ लें’’

        मेरा नाम सुशीला है और मेरी उम्र 45 वर्ष है। हैं। मेरे पति सुखई है|वह खेती का काम करते हैं| मैं भी घर गृहस्थी के साथ साथ खेती में उनका हाथ बंटाती हूँ। हमारे बच्चे है| जो अब सभी बड़े हो गये  हैं| खेती बारी में हमारे साथ मदद करते है| मैं बैरवन,थाना राजातालाब,जिला-वाराणसी की मूल निवासिनी हूँ|

        16 मई 2023 का दिन था। समय लगभग 11 बजे थे। मैं अपने खेत में काम कर रही थी| जब अचानक शोर सुनाई दिया। मैंने देखा कि पुलिस और अन्य लोग जेसीबी और बुलडोजर लेकर हमारे खेतों पर जबरन कब्जा करने आ गए। गाँव के लोग बोले  बिना मुआवजा दिए हमारी जमीन पर कब्जा क्यों किया जा रहा है।लेकिन प्रशासन यह बात मानने को तैयार नही थी|

        मैं भी वहाँ पर थी गाँव के लोगों के साथ इस बात का विरोध कर रही थी। कुछ लोग जेसीबी के आगे लेट गए थे| ताकि उसे रोका जा सके। तभी एक औरत को पुलिस वाले ने मारा वह गिर पड़ी। इसके बाद अफरा-तफरी मच गई। पुलिस वालों ने लाठी चार्ज शुरू कर दिया। लोग अपने घर और सिवान की ओर भागने लगे। मैं भी वहाँ से भागने लगी, लेकिन दौड़ते हुए मुझे धक्का लगा और मैं वहीं गिर पड़ी। मैं रोने चिल्लाने लगी। गाँव के कुछ लोग मुझे सहारा देकर उठाए और साथ में लेकर भागे।

जब हम लोग घर पहुँचे, तो देखा कि पुलिस हमारे घर में आ चुकी थी। वे सभी बाहर रखा सामान तोड़ रहे थे। बर्तन, खटिया, चूल्हा - सब कुछ खत्म कर दिया। यह देखकर मैं बहुत डर गयी। मुझे अपने घर की तीन बेटियों की चिंता सताने लगी, इसलिए मैंने उन्हें रिश्तेदारों के यहाँ पहुँचा दिया। हम सभी बहुत डरे हुए थे। शाम को खाना बनाकर हम पुल के पास जाकर सोते थे ताकि पुलिस से बच सकें।

        पुलिस गाँव के 11 लोगों को पकड़ कर ले गई थी। हमें डर था कि कहीं वे हमें भी न पकड़ लें। यह डर हर वक्त बना था| उस वक्त बस यही सोचकर अपनी किस्मत पर रोते कि हमारी जमीन भी बिना मुआवजा दिए ली जा रही है और हमें प्रताड़ित भी किया जा रहा है।कई दिनों तक पुलिस रात में हमारे घर आती और पूछताछ करती।हम सभी बहुत डरे हुए थे और हर समय अनहोनी की आशंका हमारे मन में बनी रहती थी।

        उस दिन के बाद से हमारा जीवन पूरी तरह बदल गया। हम गाँव में असुरक्षित हो गये। हमारी खेती ठप हो गई भुखमरी की कगार पर हम पहुच गये|मेरे पति सुखई भी बहुत चिंता में रहने लगे| उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे कैसे इन सब परेशानियों का सामना करे|

        यह घटना केवल हमारे परिवार के लिए बल्कि पूरे गाँव के लिए एक बड़ी आपदा थी। सभी लोग डरे और सहमे हुए थे। गाँव की महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग सभी इसके बाद से भयभीत और परेशान थे। रात में लोगो को नीद नही आती| कही आने जाने का मन नही करता था| शादी व्याह तीज त्योहार सब बेमाने थे|

    मै बस यही चाहती हूँ कि प्रशासन ने हमारी आवाज़ नहीं सुनी| हमे यातना दिया| उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाय| जिससे हमारी जमीन पर हमारा मालिकाना हक हो|हमें न्याय और सुरक्षा मिले

 

                                                                                                 संघर्षरत पीड़िता

                                                                                                                 सुशीला

 

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